शुक्रवार, 29 अगस्त 2025

अकबर का दीन-ए-इलाही और धार्मिक सहिष्णुता

अकबर का दीन-ए-इलाही: मुग़ल सम्राट अकबर की धार्मिक सहिष्णुता और सर्वधर्म संभाव नीति पर 1000 शब्दों का लेख। इतिहास, विशेषताएँ और महत्व।”


प्रस्तावना

भारत का इतिहास धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक विविधताओं से भरा हुआ है। मुग़ल सम्राट अकबर (1542–1605) न केवल एक महान शासक थे, बल्कि धार्मिक सहिष्णुता और सामाजिक समरसता के प्रतीक भी बने। अकबर का सबसे अनोखा प्रयोग था “दीन-ए-इलाही”, जो 1582 ई. में प्रारंभ हुआ। यह एक नया धर्म न होकर विभिन्न धर्मों की शिक्षाओं का संगम था, जिसका उद्देश्य था – धार्मिक एकता और शांति स्थापित करना।




अकबर की धार्मिक नीति

अकबर प्रारंभ में एक कट्टर मुस्लिम शासक की तरह शासन कर रहे थे, परंतु समय के साथ उन्होंने महसूस किया कि उनके विशाल साम्राज्य में हिंदू, जैन, बौद्ध, पारसी, ईसाई और मुसलमान सभी रहते हैं। यदि शासन को स्थिर बनाना है तो सभी धर्मों के अनुयायियों को समान सम्मान देना आवश्यक है।

उन्होंने जज़िया कर (धार्मिक कर) को समाप्त किया।

हिंदुओं को प्रशासन और सेना में उच्च पद दिए।

विभिन्न धार्मिक नेताओं को अपने दरबार में आमंत्रित किया।


इबादतखाना और धार्मिक संवाद

फतेहपुर सीकरी में अकबर ने इबादतखाना बनवाया, जहाँ विभिन्न धर्मों के विद्वान मिलकर धर्म और दर्शन पर चर्चा करते थे। यहाँ ईसाई पादरी, हिंदू पंडित, जैन साधु और सूफी संत सभी एक साथ बैठकर धार्मिक विचार साझा करते थे।

दीन-ए-इलाही का उदय

1582 ई. में अकबर ने दीन-ए-इलाही की स्थापना की। यह कोई नया धर्म न होकर एक आध्यात्मिक और नैतिक आंदोलन था।
मुख्य विशेषताएँ:

1. ईश्वर एक है और सभी धर्म उसी की ओर मार्गदर्शन करते हैं।


2. सभी धर्मों की श्रेष्ठ शिक्षाओं को अपनाना।


3. हिंसा का विरोध और नैतिक जीवन पर जोर।


4. ईमानदारी, दया और सहिष्णुता को प्राथमिकता।


5. राजा (अकबर) को ‘इमाम-ए-आदिल’ यानी न्यायप्रिय नेता माना गया।


दीन-ए-इलाही में शामिल लोग

इसमें बहुत कम लोग शामिल हुए – जैसे अबुल फज़ल, बीरबल आदि। अधिकांश लोग इसे स्वीकार नहीं कर पाए क्योंकि यह पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं से भिन्न था।

धार्मिक सहिष्णुता की मिसाल

अकबर का वास्तविक योगदान दीन-ए-इलाही से अधिक उनकी धार्मिक सहिष्णुता की नीति थी। उन्होंने हर धर्म के प्रति सम्मान का भाव रखा।

जैन साधु हरिविजय सूरि से प्रेरित होकर पशुहत्या पर कुछ प्रतिबंध लगाए।

सिख गुरुओं से अच्छे संबंध बनाए।

ईसाई पादरियों से मिलकर ईसाई धर्म की बातें जानीं।


आलोचना और सीमाएँ

कुछ इतिहासकार मानते हैं कि दीन-ए-इलाही केवल अकबर के व्यक्तिगत प्रयोग तक सीमित रहा।

इसका प्रभाव जनता तक नहीं पहुँच पाया।

बाद के मुग़ल शासकों ने इसे आगे नहीं बढ़ाया।



ऐतिहासिक महत्व

भले ही दीन-ए-इलाही एक छोटा प्रयोग था, लेकिन यह अकबर की धर्मनिरपेक्ष सोच और सामाजिक समरसता की दृष्टि को दर्शाता है। इसने भारत में धार्मिक सहिष्णुता और “सर्वधर्म संभाव” की परंपरा को मजबूत किया।

निष्कर्ष

अकबर का दीन-ए-इलाही आज भले ही इतिहास के पन्नों तक सीमित हो, लेकिन उसकी शिक्षा आज भी प्रासंगिक है। भारत जैसे विविधताओं वाले देश में अकबर का संदेश स्पष्ट है – धर्म से बढ़कर मानवता है


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