मकर संक्रांति भारत का एक प्रमुख और पवित्र पर्व है, जो हर वर्ष 14 या 15 जनवरी को मनाया जाता है। यह पर्व सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने और शीत ऋतु के समाप्त होने का प्रतीक है। इसे भारत के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग नामों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है।
उत्सव का महत्व
मकर संक्रांति को धार्मिक और खगोलीय दृष्टि से विशेष माना जाता है। इस दिन से सूर्य उत्तरायण हो जाता है, जिससे दिन लंबे और रातें छोटी होने लगती हैं। इसे नए फसल सीजन की शुरुआत के रूप में भी देखा जाता है। इस पर्व को दान-पुण्य, नदियों में स्नान, और सूर्य पूजा का दिन माना जाता है।
पर्व का क्षेत्रीय स्वरूप
1. उत्तर भारत:
उत्तर प्रदेश और बिहार में इसे खिचड़ी पर्व कहा जाता है। लोग गंगा स्नान करते हैं और तिल-गुड़ का सेवन व दान करते हैं।
2. पश्चिम बंगाल:
यहां इसे पौष संक्रांति कहा जाता है। लोग तिल और नारियल से बनी मिठाईयां खाते हैं।
3. पंजाब और हरियाणा:
इसे लोहड़ी के रूप में मनाया जाता है, जो एक दिन पहले मनाई जाती है।
4. गुजरात और महाराष्ट्र:
पतंगबाजी इस पर्व का मुख्य आकर्षण है। लोग एक-दूसरे को तिल-गुड़ देकर कहते हैं, "तिल गुड़ खाओ और मीठा बोलो।"
5. तमिलनाडु:
यहां इसे पोंगल के रूप में चार दिनों तक मनाया जाता है।
6. आंध्र प्रदेश और कर्नाटक:
इसे संक्रांति कहते हैं। लोग गोबर से बनी मूर्तियों की पूजा करते हैं।
परंपराएं और रीति-रिवाज
दान-पुण्य: तिल, गुड़, कपड़े, अन्न, और जरूरतमंदों को दान देना शुभ माना जाता है।
पतंगबाजी: इस दिन आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाता है।
विशेष पकवान: तिल-गुड़ के लड्डू, खिचड़ी, पोंगल, और अन्य पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं।
संदेश
मकर संक्रांति न केवल हमारी सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है, बल्कि यह हमें प्रकृति और मानवता से जुड़ने का संदेश भी देता है। यह पर्व हमें नई ऊर्जा और उत्साह के साथ जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
"तिल गुड़ खाओ, मीठा-मीठा बोलो!"
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