सोमवार, 12 जनवरी 2026

उत्तर-पूर्व भारत की स्वतंत्रता गाथाएँ: वो वीर कथाएँ जो इतिहास की मुख्यधारा से छूट गईं




उत्तर-पूर्व भारत की स्वतंत्रता गाथाएँ – असम, मणिपुर, नागालैंड और त्रिपुरा के वीर स्वतंत्रता सेनानियों की अनसुनी कहानियाँ पढ़ें।




भारत के स्वतंत्रता संग्राम की चर्चा होते ही झांसी की रानी, गांधीजी, भगत सिंह जैसे नाम सामने आते हैं। लेकिन भारत का उत्तर-पूर्वी क्षेत्र भी आज़ादी की लड़ाई में पीछे नहीं था। यहाँ के जंगलों, पहाड़ों और जनजातीय समाज ने अंग्रेज़ी सत्ता के खिलाफ अद्भुत साहस दिखाया।

1. असम – लचित बोरफुकन की विरासत
असम में अंग्रेज़ों के खिलाफ जन-जागरण बहुत पहले शुरू हो गया था।
लचित बोरफुकन ने मुग़लों को पराजित कर स्वाभिमान की जो परंपरा बनाई, वही आगे चलकर स्वतंत्रता संग्राम की प्रेरणा बनी।
असम में चाय बागान मजदूर आंदोलन, असम छात्र आंदोलन और जनजातीय विद्रोहों ने ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी।

2. मणिपुर – रानी गाइदिन्ल्यू का साहस
रानी गाइदिन्ल्यू, जो केवल 13 वर्ष की उम्र में आंदोलन में कूद पड़ीं, अंग्रेज़ों के लिए चुनौती बन गईं।
उन्होंने नागा समुदाय को एकजुट कर स्वतंत्रता और सांस्कृतिक रक्षा का संदेश दिया।
नेहरू जी ने उन्हें “रानी” की उपाधि दी।

3. नागालैंड – जनजातीय प्रतिरोध
नागा जनजातियाँ कभी भी बाहरी शासन को स्वीकार नहीं करती थीं।
उन्होंने गुरिल्ला युद्ध शैली में अंग्रेज़ों को भारी नुकसान पहुँचाया।
यह संघर्ष केवल राजनीतिक नहीं बल्कि संस्कृति, भूमि और पहचान की रक्षा का था।

 4. त्रिपुरा – जन आंदोलन की चिंगारी
त्रिपुरा में आदिवासी समाज ने जंगलों से निकलकर स्वतंत्रता आंदोलन को मजबूत किया।
यहाँ के राजाओं और जनता ने मिलकर अंग्रेज़ी सत्ता को चुनौती दी।

 5. महिलाओं की भूमिका
उत्तर-पूर्व में महिलाएँ केवल दर्शक नहीं थीं।
वे हथियार उठाने से लेकर आंदोलन का नेतृत्व करने तक हर भूमिका में थीं।

🇮🇳 निष्कर्ष

उत्तर-पूर्व भारत की स्वतंत्रता गाथाएँ हमें सिखाती हैं कि आज़ादी केवल मैदानों में नहीं, बल्कि जंगलों और पहाड़ों में भी लड़ी गई।
इन वीरों की कहानियाँ हमारी राष्ट्रीय स्मृति का अभिन्न हिस्सा हैं।

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