बुधवार, 17 सितंबर 2025

चोल साम्राज्य और दक्षिण भारत का उत्कर्ष : कला, प्रशासन और समुद्री शक्ति का स्वर्ण युग



चोल साम्राज्य का इतिहास, कला, मंदिर वास्तुकला और समुद्री व्यापार में दक्षिण भारत के उत्कर्ष की विस्तृत जानकारी।



प्रस्तावना

भारतीय इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में चोल साम्राज्य का नाम अत्यंत गौरव के साथ लिया जाता है। दक्षिण भारत के तमिल क्षेत्र में स्थापित यह साम्राज्य न केवल अपने प्रशासन और मंदिर वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध था, बल्कि समुद्री व्यापार और संस्कृति के प्रसार में भी अग्रणी रहा। 9वीं से 13वीं शताब्दी तक चोल वंश ने जिस प्रकार दक्षिण भारत को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई, वह अद्वितीय है।



चोल साम्राज्य की स्थापना

चोल वंश की जड़ें प्राचीन संगम काल तक जाती हैं, लेकिन इसका सर्वाधिक उत्कर्ष 9वीं शताब्दी में आदित्य चोल प्रथम से शुरू हुआ। उनके उत्तराधिकारी परांतक चोल, राजराजा चोल प्रथम और राजेंद्र चोल प्रथम ने साम्राज्य को उच्चतम शिखर पर पहुँचाया।


राजराजा चोल और राजेंद्र चोल का योगदान

राजराजा चोल प्रथम (985–1014 ई.): तंजावुर में भव्य बृहदीश्वर मंदिर का निर्माण कराया, जो आज भी यूनेस्को विश्व धरोहर है।

राजेंद्र चोल प्रथम (1014–1044 ई.): समुद्री शक्ति को बढ़ाते हुए श्रीलंका, मालदीव और दक्षिण-पूर्व एशिया तक चोल प्रभाव का विस्तार किया।


प्रशासन और समाज

चोल प्रशासन अत्यंत संगठित था। ग्राम पंचायत प्रणाली (उर और सभा) ने लोकतांत्रिक परंपराओं को बल दिया। कृषि, सिंचाई और राजस्व व्यवस्था ने समृद्धि सुनिश्चित की।

कला और वास्तुकला

बृहदीश्वर मंदिर, गंगईकोंडा चोलपुरम और दारासुरम जैसे भव्य मंदिर चोल कला की ऊँचाई दर्शाते हैं।

कांस्य प्रतिमाएं, विशेषकर नटराज की मूर्ति, आज भी विश्वभर में प्रसिद्ध हैं।


समुद्री व्यापार और नौसेना

चोल नौसेना उस समय एशिया की सबसे शक्तिशाली सेनाओं में गिनी जाती थी। दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों (सुमात्रा, मलक्का, जावा) तक व्यापार और सांस्कृतिक प्रभाव स्थापित किया।

संस्कृति और धर्म

शैव और वैष्णव भक्ति आंदोलन को बल मिला। तामिल साहित्य—कम्बन रामायण, भक्त कवियों की रचनाएं—समाज में नई चेतना लाईं।



पतन

13वीं शताब्दी में पांड्य और होयसला शक्तियों के उदय से चोल साम्राज्य का पतन शुरू हुआ। किन्तु इसकी कला, संस्कृति और प्रशासनिक प्रणाली आज भी प्रेरणा देती है।

निष्कर्ष

चोल साम्राज्य ने दक्षिण भारत को वैश्विक पहचान दी। उनकी समुद्री शक्ति, कला और प्रशासनिक कौशल ने भारतीय उपमहाद्वीप को गौरवान्वित किया। आज भी तंजावुर का बृहदीश्वर मंदिर उनकी अद्वितीय उपलब्धियों का प्रतीक है।


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