झारखंड आंदोलन का इतिहास, आदिवासी संघर्ष, जयपाल सिंह मुंडा की भूमिका और 15 नवंबर 2000 को झारखंड राज्य गठन की पूरी कहानी विस्तार से पढ़ें।
✍️ Introduction
झारखंड केवल एक राज्य नहीं, बल्कि संघर्ष, पहचान और स्वाभिमान की जीत की कहानी है। यह आंदोलन आदिवासी समाज के जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए शुरू हुआ, जिसने अंततः 15 नवंबर 2000 को भारत के 28वें राज्य के रूप में झारखंड को जन्म दिया।
🔶 झारखंड आंदोलन की पृष्ठभूमि
ब्रिटिश शासन के दौरान छोटानागपुर और संथाल परगना क्षेत्र के आदिवासियों का शोषण बढ़ता गया। बाहरी जमींदारों, महाजनों और अंग्रेज अफसरों ने आदिवासियों की जमीन हड़प ली। इससे असंतोष की आग भड़की।
🔶 बिरसा मुंडा और प्रारंभिक विद्रोह
19वीं सदी के अंत में धरती आबा बिरसा मुंडा ने “उलगुलान” (महाविद्रोह) का नेतृत्व किया।
उनका नारा था –
“अबुआ दिशुम, अबुआ राज” (हमारा देश, हमारा राज)
यद्यपि बिरसा मुंडा कम उम्र में शहीद हो गए, लेकिन उन्होंने झारखंड आंदोलन की नींव रख दी।
🔶 आज़ादी के बाद आंदोलन की नई दिशा
1947 के बाद भी झारखंड क्षेत्र बिहार का हिस्सा बना रहा।
1950 के दशक में जयपाल सिंह मुंडा के नेतृत्व में झारखंड पार्टी बनी, जिसने अलग राज्य की मांग को राजनीतिक मंच दिया।
🔶 झारखंड आंदोलन की प्रमुख मांगें
आदिवासी पहचान की रक्षा
प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय अधिकार
भाषा और संस्कृति की सुरक्षा
प्रशासनिक उपेक्षा का अंत
🔶 1970–90 का दौर: आंदोलन का उग्र रूप
इस दौर में:
झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) का गठन
शिबू सोरेन का नेतृत्व
बड़े आंदोलन, गिरफ्तारियाँ और बलिदान
देशभर में झारखंड की मांग को पहचान मिली।
🔶 राज्य गठन की ऐतिहासिक घड़ी
15 नवंबर 2000
(भगवान बिरसा मुंडा की जयंती)
झारखंड को अलग राज्य का दर्जा मिला।
पहली राजधानी – रांची
🔶 झारखंड आंदोलन का महत्व
यह आंदोलन बताता है कि:
लोकतंत्र में संघर्ष की ताकत
आदिवासी समाज की एकता
संवैधानिक अधिकारों की जीत
🔶 आज का झारखंड
आज झारखंड खनिज संसाधनों से समृद्ध है, लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार अभी भी चुनौतियाँ हैं। आंदोलन की मूल भावना आज भी प्रासंगिक है।
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